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                                                                                                                                      बांसुरी पर आखिर क्या बजाते थे भगवान कृष्ण!  मोहक, मनमोहिनी, मन को हरने वाले मधुर सुरों से युक्त सुरों के समूह जब आपके तन मन को बस भक्ति रस में डूबों दे, तब उस माहौल और पवित्र सुरों की बात ही कुछ ओर होगी। स्वयं भगवान श्रीकृष्ण जब बांसुरी बजाते होंगे तब सुर भी अपने आप आत्ममुग्ध होते होंगे, इठलाते होंगे, इतराते होंगे कि हम तो सही मायने में श्रीमुख से ही निकल रहे हैं। हमारा सृजन तो स्वयं नारायण कर रहे है। सभी सुर भक्ति रस में पगे और मधुरता का चोला ओढ़कर ब...

प्रेम घटे कछु मांगत तें

प्रेम घटे कछु मांगत तें कोरोना ने कलाकारों को आर्थिक व मानसिक रुप से भी भीतर तक प्रभावित किया है (अनुराग तागड़े) मांगन से मरन भला...मत मांगे कभी भीख यही सदगुरु की सीख...कोरोनाकाल में मंच पर अपना कला का प्रदर्शन करने वाले कलाकारों की आर्थिक स्थिति ऐसी हो गई है कि वे किसी से कुछ मांग नहीं सकते क्योंकि ऐसा उन्होंने पहले किया नहीं है। मन में ऐसा ही भाव आता है कि मांगन से मरन भला। पद्मविभूषण पं छन्नुलाल मिश्र जैसे दिग्गज कलाकार ने अपने बेटे और पत्नी को खोया और ऐसे बुजुर्ग कलाकार के मन की स्थिति क्या होगी यह समझा जा सकता है। एक चैनल से इंटरव्यू में उनसे पूछा है कि खैलें मसाने में होरी दिगंबर आप खूब गाते है पर बेटे और पत्नी की मृत्यु के बाद वही शमशान की तस्वीरों ने आपको विचलित किया होगा। मेरा मानना है कि एक ऐसे बुजुर्ग कलाकार से जिसने अपनी पत्नी और बेटे को कोरोना में खोया है और जो अपनी आर्थिक सेहत और पत्नी बेटे के इलाज की असलियत जानने के लिए गुहार लगा रहा है उससे यह प्रश्न पूछना क्या जरुरी है ? कि आपको बेटे और पत्नी की मृत्यु के बाद शमशान की तस्वीरें कैसी लगी ? दरअसल भावनाशून्य होकर आप को...

संकटकाल में सुरों की साधना भी बेमानी!

- अनुराग तागड़े (लेखक वरिष्ठ पत्रकार और रंगकर्मी हैं) देवतत्व में निहित निरागस अवस्था या अध्यात्म में तुरीय स्थिति के बोध का स्मरण सच्चे सुर लगने पर होता है। सुर निर्मल होते है सत्य, सुंदर और निराकार होते हैं। एक तपस्वी की तरह सुर को साधने के लिए कलाकार सुरों से परिचय प्राप्त करता है और यह कठिनतम प्रक्रिया होती है, जिसे रियाज कहते हैं। यह रियाज उन सुरों से दोस्ती करने की प्रक्रिया से प्रेम तक पहुंचती है। यह सबकुछ साधक की साधना पर निर्भर करता है कि वह कितनी साधना की गहराई में उतरना चाहता है और कितने घंटो की मेहनत से इसे सीखना चाहता है। यह प्रक्रिया लगातार चलती ही रहती है। सुरों की खासियत यह है कि वे बड़े चंचल भी है अगर आप लगातार रियाज नहीं करेंगे, तब वे सध भी नहीं पाएंगे। आपको गच्चा दे जाएंगे और कहेंगे बहुत गुमान है अपने आप पर। 000 सुर साधने की प्रक्रिया बेहद कठिन है। इस यात्रा पर चलते बहुत हैं, पर नियत परिणाम कम ही लोगों को मिल पाते हैं। कई साधक यात्रा बीच में छोड़ देते हैं, कुछ ऐसे होते हैं, जो पहुंच भी जाते है। इतनी कड़ी साधना करने के बाद भी कोई कलाकार की श्रेणी में आ पात...
  रंगकर्म ने  संक्रमण दौर में   नई राह खोजी   - अनुराग तागड़े (लेखक वरिष्ठ पत्रकार और रंगकर्मी हैं) ------------------------------ -----------------     शौकिया रंगकर्म करने वाले कलाकार हजारों की संख्या में हैं। रंगकर्म करने के पीछे उनकी जिद और जुनून है। ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि इस जिद और जुनून की पीछे क्या है! नाटक करना है तो पूरा दल लग जाता है। इससे मतलब यह नहीं कि मंच पर सामने कौन दिख रहा है, बस जुनून है सर्वश्रेष्ठ करने का। पार्श्वसंगीत से लेकर नेपथ्य के लिए टीम अपना श्रेष्ठ देने की कोशिश इसलिए करती है, दर्शकों को पसंद आना चाहिए। रंगकर्म में ही कर्म जुड़ा है, इस कारण इस क्षेत्र में ढेर सारी मेहनत और कुछ शोहरत है। कई कलाकार अपनी जिंदगी लगा देते हैं, तब जाकर उन्हें थोड़ी बहुत पहचान मिल पाती है। पर, वे इतनी मेहनत पैसा और पहचान के लिए नहीं, बल्कि उनके भीतर रंगकर्म के क्षेत्र में कुछ करने का जुनून होता है और या रंगकर्म का रंग उन्हें अपने में इस तरह भिगो देता है कि वे बस उसी में रमना चाहते है। उसमें रंगना चाहते है और वहीं करना चाहते हैं।  ...

स्मृति शेष पद्मविभुषण गिरिजा देवी...

<script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-4047862364003617" crossorigin="anonymous"></script> सांगितिक आभा मंडल के दैदिप्यमान ओज से वे दमकती रहती थी (अनुराग तागड़े) जितनी लरजती गरजती उनकी आवाज उतना ही मीठा उनका बोलना...शब्दों का चयन भी जैसे कौन सबसे ज्यादा मीठा है यह विचार करके करती थी। गायकी के कई स्वरुप आए...तैयारी वाले कलाकार भी आए और चले गए परंतु गिरिजा देवी अपनी साधना और कार्यक्रमों में मस्त...वे सुरों की सच्चाई और गहराई को जानती थी और सच्चे सुर ही परब्रह्म है इस पर उनकी सिद्धहस्तता थी। दुनिया जहां उन्हें ठुमरी क्वीन के नाम से जानती है पर रागदारी पर क्या पकड़ थी उनकी। किसी भी राग की शुद्धता को वे कभी नहीं छोड़ती थी और अमूमन यह कहा भी जाता है कि अगर कोई ठुमरी,चैती,होरी और गजÞल गायक है तब वह शास्त्रीय रागों के साथ उतना न्याय नहीं कर पाता है परंतु गिरिजा देवी मुंह में पान गिलौरियां भले ही चबा रही हो पर जब बात रागों की आती तब चेहरे पर भी गंभीरता और पवित्रता का अनुठा संगम देखने को मिलता था। ...

मुकुल राय के माध्यम से कैलाश जी का कद बढेगा?

- कैलाश विजयवर्गीय को कोर्ट से राहत भी मिल चुकी है (अनुराग तागड़े) इंदौर। भाजपा महासचिव कैलाश विजयवर्गीय को पार्टी ने पश्चिम बंगाल की कमान सौपी थी। मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी के तेवर और वहां पर टीएमसी कार्यकर्ता जिस प्रकार से व्यवहार कर रहे थे उससे साफ जाहिर था कि पश्चिम बंगाल में मामला वैसा नहीं है जैसा सोचा जा रहा था और पश्चिम बंगाल में चुनाव परिणाम में यह बात सामने आ भी गई थी। इसके बावजुद भाजपा महासचिव ने लगातार पश्चिम बंगाल में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई। वहां के बड़े दिग्गज भाजपा नेताओं के साथ मिलकर कैलाश विजयवर्गीय ने विरोध प्रदर्शन और धरने भी दिए। टीएमसी से इस्तीफा देने के बाद बड़े नेता मुकुल राय ने भाजपा का दामन थामा है। मुकुल राय भाजपा महासचिव कैलाश विजयवर्गीय से संपर्क में थे और उन्हें समारोह पूर्वक भाजपा में शामिल किया गया। भाजपा के लिए बंगाल में यह एक शुरुवात हो सकती है वही दूसरा पक्ष यह भी है कि मुकुल राय पर सारदा चिटफंड घोटाले में शामिल होने का आरोप लगा हुआ था और सीबीआई की जांच में भी उनका नाम है इस कारण उन्होंने भाजपा का दामन थाम लिया है। वही ममता बेनर्जी ने मुकुल राय क...

कांग्रेस में आजकल क्या चल रहा है...नर्मदा यात्रा

(अनुराग तागड़े) नर्मदे हर...की गूंज और कांग्रेस नेता की पूछपरख दोनों में समानताओं का दौर जब चलने लगे तब अनुभवी कांग्रेसी नेता पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के दबदबे का एहसास होता है। नर्मदा किनारे वे यात्रा कर रहे है और कयासो का दौर लगातार चलते जा रहा है। शहर कांग्रेस से लेकर प्रदेश कांग्रेस में बस एक ही बात है क्या चल रहा इन दिनों कांग्रेस में बस नर्मदा यात्रा चल रही है। सही मायने में नर्मदा यात्रा के माध्यम से पूर्व मुख्यमंत्री छालो,पैरों का दर्द और यात्रा करने का सुकुन का एहसास जरुर कर रहे है परंतु यह यात्रा स्पंदन पैदा कर रही है कांग्रेस में और आम कांग्रेसी कार्यकर्ताओं में। दिग्विजय सिंह भले ही रोजाना कुछ किलोमीटर पैदल चल रहे हो पर नर्मदा किनारे से कई किलोमीटर दूर तक यात्रा का असर नजर आता है। यात्रा को देखादेखी की यात्रा शुरुवाती दौर में कहा जा रहा था परंतु जिन लोगो ने यात्रा को करीब से देखा वे कहने लगे कि ये क्या नेताजी सही मायने में चल रहे है और नर्मदा किनारे पैदल ही चल रहे है और कोई दिखावा नहीं। प्रदेश कांग्रेस के भीतर हल्के उत्साह की लहर अभी भी न महसूस की जा रही हो परंत...

परमात्मा का भेद जानने की ओढ

(अनुराग तागड़े) मन को नियंत्रित करने की बातें सुनने में काफी अच्छी लगती है पर कम लोग ही नियंत्रण की बात को आत्मसात कर पाते है। यह राह अपने आप में बिरली है जिस पर चल पाना हरेक के बस की बात नहीं है क्योंकि नियंत्रण हम आदतों पर नहीं कर पाते तब मन के नियंत्रण की बात बहुत दूर हो जाती है। मन को चंचल कहा गया है पर असल में मन का स्वरुप सकारात्मक और नकारात्मक दोनों रहता है जैसे हीरो और विलेन फिल्मों में रहते है वैसे ही मन की अवस्था भी होती है वह किसी भी घटना को लेकर तत्काल आपको उसके सभी पक्षों से अवगत करवा देता है। और अवगत करवाने वाली प्रक्रिया इस बात पर निर्भर करती है कि आप किस परिवेश में पले बढ़े है और आप किस वातावरण में रह रहे है। मन आदत में पड़ जाता है पर उस दौर में भी आपको लगातार अपनी बात बताता रहता है यह बात अलग होती है कि हम सुनते नहीं है। इन सभी बातों के बीच जब मन को नियंत्रित करने की बात आती है तब मन विद्रोही तेवर ही अपना लेता है व नियंत्रित नहीं होना चाहता वह आवारागर्दी करने लगता है और कई बार बावले की तरह हरकतें भी करता है। वह अपने घोड़े दौड़ाने में ज्यादा विश्वास करता है और बार बा...

चकमस्ती में आग लगे बस्ती में...

(अनुराग तागड़े) भिया किधर....मल्लारगंज काम से जा रिया हूँ अरे मेरे को भी छोड दे यार राजवाड़े पे...आ बैठ चलते हे। भिया सही के रिया हूँ अपने सेर की बात ही अलग हेगी...खाने पीने में सबकुछ एक नंबर हेगा...हां भिया पर मेरे को लग रिया हेगा कि सेर में अब राजनीतिवाले लोगोन काम बिगाड़े भोत कर रिये हेंगे...अपने लोगोन तो क्या है किधर भी कुछ भी कर लियो बोलते ही नी हेंगे। वो भिया परसो में सांची वाले से झिगझिग कर रिया था अरे वो मानने को ही तैयार नी हेगा कि गलती हो गई हेगी। भिया ये लोगोन सुधरने को तैयार ही नी मेने बोला भिया क्या हुआ तुम्हारे टैंकरोन का...मिलावट तो भोत की तुम लोगोन ने अब भी नी मान रिये हो। वो बोला भिया तुम मान ही नी रिये हो अब सबकुछ सहीसाट चल रिया हेगा। भिया अपन तो एबले हेंगे बोल दिया परमाण क्या हेगा? अपना दिमाग सटका तो फिर अपन किसी के नी...पर तुम लोगोन सांची का दूध लेते थे क्या वो दुकान से...नी भिया वो तो ऐसे ही मजे ले रिया था ईन लोगोन को भी तो समझ में आनी चिए ना कि हम भी कम थोड़े ही हे। पर भिया अपना तो सोचना ही ऐसा हेगा कि रहो चकमस्ती में आग लगे बस्ती में पर ये लोगोन सुधरहीच नी रिये...

राजनीति में कोई किसी का सगा नहीं

- भाजपा के भीतर मारपीट कांड के बाद सन्नाटा (अनुराग तागड़े) इंदौर। राजनीति में अपने आप को ऊपर ले जाने के लिए किसी भी हद तक लोग जा सकते हैं और नेता तो जाते ही हैं। दशहरा मैदान मारपीट कांड के बाद यह कहा जा रहा है कि बात दिल्ली तक पहुंच गई है और बहुत सारी बाते हो रही हैं। इन सभी बातों में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भाजपा प्रदेशाध्यक्ष नंदकुमार चौहान के सामने सब कुछ हुआ याने अनुशासन नाम की कोई बात ही नहीं रही। उद्योगपति हेमंत नीमा के साथ जो व्यवहार किया गया वह किसी भी धार्मिक आयोजन स्थल पर नहीं होना चाहिए।  प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार दोनों के बीच कहासुनी हुई और इसमें कई ऐसी बातें भी थीं जो भाजपा शहर अध्यक्ष कैलाश शर्मा को चुभ गईं। ऐसी कौन सी बातें थीं जिसके कारण कैलाश शर्मा का पारा एकदम आसमान पर पहुंच गया और प्रदेशाध्यक्ष नंदकुमार चौहान के सामने लोगों ने नीमा के साथ न केवल झूमाझटकी की बल्कि प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार मारा भी गया है जिसमें यह कह कर मारा कि आपने हमारे शहर अध्यक्ष का अपमान किया है। यह अजीब है जब प्रदेश अध्यक्ष स्वयं खड़े हैं तब शहर अध्यक्ष का अपमान होने के बाद ...

तेजी से बढ़ रहे एविएशन सेक्टर के लिए क्या म.प्र. तैयार है?

- वर्ष 2020 तक भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा एविएशन बाजार - वर्ष 2030 तक भारत में हवाई अड्डों की संख्या होगी 250 - भारतीय हवाई अड्डों पर वर्ष 2032 तक 11.4 मिलियन टन मालभाड़ा जाएगा - सभी हवाई अड्डों पर बायोमेट्रिक जानकारियों से प्रवेश होगा (अनुराग तागड़े) इंदौर। शहर से विदेश के लिए सीधी उड़ान की तैयारियों के बीच यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि इंदौर में जेट एयरलाइंस ने नाईट पार्किंग के लिए भी जगह मांगी है। यह दोनों तथ्य इस बात की ओर इंगित कर रहे हैं कि इंदौर की तरफ अगर प्रदेश सरकार सही तरह से ध्यान दे तो इंदौर के देवी अहिल्याबाई होलकर हवाई अड्डे की तेजी से प्रगति को कोई नहीं रोक सकता। जिस प्रकार से लो कॉस्ट एयरलाइंस को सफलता मिल रही और भारतीय अर्थव्यवस्था जिस प्रकार से आकार ले रही है उससे साफ जाहिर है कि हवाई यातायात में तेज गति से वृद्धि होना है। प्रदेश में इंदौर और भोपाल ही ऐसे हवाई अड्डे हैं जहां से बहुत ज्यादा बिजनेस आने की उम्मीद है। दोनों ही हवाई अड्डों में से इंदौर ने जो प्रगति की है वह अपने आप में काबिलेतारीफ है। इंदौर हवाई अड्डे ने तीन वर्षों में 4 लाख यात्रियों की बढोत्तरी...

गजक गराडू वाली ठंड

(अनुराग तागड़े) ठंड का मौसम याने खानपान का मौसम और इस मौसम में इंदौरियत बिल्कुल शबाब पर रहती है। खालिस इंदौरी लोगों की बात की जाए तो सही मायने में यह गजक गराडू वाला मौसम अपने आप में तरावट लाने वाला होता है। सामान्य दिनों में घर पर खाना खाने के बाद ठंड का मजा लेने के लिए बाहर निकले और गरम दूध के कढ़ाव में से एक गिलास गरमा गरम दूध और उसमें एक दोना रबड़ी का डालकर राजवाड़े के आसपास घूमने का जो सुख है वह असली इंदौरी को ही समझ आ सकता है। हम इंदौरी ऐसे ही हैं हमें गराडू, गजक खाना बहुत पसंद है और हम देर रात तक सराफे में डेरा डालकर यह सब कुछ खाने में गौरवान्वित महसूस करते हैं। ठंड में तो गरमा गरम जलेबी का स्वाद और भी बढ़ जाता है। ठंड सही समय पर निर्धारित मात्रा में ठंडक लेकर आ जाती है तब सही मायने में मौसम सुहाना हो जाता है। चौराहों पर अलाव जला कर बैठे लोगों के साथ हम भी हाथ सेंक कर गरमाहट ले लेते हैं। दरअसल ठंड याने सुबह के समय के बेहतरीन नाश्ते से लेकर देर शाम आलू की कचोरी प्याज की चटनी के साथ और फिर देर शाम तक यूं ही खानपान का दौर चलता ही रहता है। मूल मुद्दा यह है कि हम खानपान को लेकर हम जब...

मां मुझे मोबाईल दिला दे मैं भी बडा बन जाऊ

बाल दिवस की सुबह से शाम हो गई पर बचपन ढूंढने पर भी नहीं मिला...सुबह की हल्की ठंड में बस्ते के बोझ के तले दबे बच्चें होमवर्क पूरा किया की नहीं की डांट सुनते हुए ओके ममा बाय कहते हुए बस में चढ़ते नजर आएं। बाल दिवस था लिहाजा स्कूलों में आभासी बाल दिवस एक इवेंट के रुप में मनाया गया जिसमें कार्यक्रम कम सेल्फियां और फोटो ज्यादा लिए गए। बचपन की बातें खूब हो रही थी एक जगह पर वे बच्चे नहीं थे। हाथों में मोबाईल लिए चिडचिड़े वे समय से पहले बड़े होने का प्रयास कर रहे थे। मां मुझे मोबाईल दिला दे मैं भी बडा बन जाऊ के तर्ज पर बच्चे अपने बचपने को तरस रहे है क्योंकि हमारा शहर भी अब मेट्रो शहरों ती तर्ज पर आभासी हो चला है। कोचिंग क्लासेस और हॉबी क्लासेस के बीच माता पिता की इच्छाओं आकांक्षाओं को लादते फिर रहे मासूमों का बचपन वीकेंड पर हेंगआउट में खो जाता है। पिज्जा बर्गर और इलेक्ट्रानिक गैजेट के मोह में वह अपने बचपन का सौदा कर जाता है जिसकी उसे बिल्कुल भी खबर नहीं है। माता पिता को यह बात नजर नहीं आती और वे लगातार अपने साथ बच्चों को भी मशीन बना रहे है। गीली मिट्टी में खेलने से रोकने वाले माता पिता बच्च...

मप्र पर्यटन विभाग को कार्यप्रणाली में बदलाव करना होगा

- होम स्टे योजना के फ्लॉप होने पर भी उसमें जान फूंकने की कवायद - अपने राज्य के लोगों की बजाए दूसरे राज्यों के लोग कमाई कर लेते हैं (अनुराग तागड़े) 9893699969 इंदौर। केवल बेहतरीन विज्ञापनों के माध्यम से हम अपने राज्य को पर्यटन के नक्शे पर लेकर आ सकते हैं परंतु लगातार पर्यटक मित्र राज्य बनने के लिए प्रदेश के पर्यटन विभाग को कमर कसना होगी। मध्यप्रदेश के पर्यटन विभाग को प्रोफेशनल तरीके से काम करना होगा। केवल आउटसोर्स करना ही इसका तरीका नहीं है बल्कि नीतियों में उस तरह से बदलाव करना होगा। दरअसल मप्र पर्यटन विभाग ने अलग-अलग जगह प्रॉपर्टी विकसित जरूर कर ली है और वहां पर रहने की सुविधाएं भी जुटा ली हैं परंतु अब भी अन्य राज्यों की तुलना में मप्र पर्यटन विभाग पर्यटकों के लिए उतना सहज नहीं है।  केरल है सबसे टूरिस्ट फ्रेंडली राज्य केरल को सबसे श्रेष्ठ टूरिस्ट फ्रेंडली राज्य कहा जाता है क्योंकि वहां पर्यटन विभाग काफी तेज गति से निर्णय लेता है और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि स्थानीय लोगों को शामिल किया जाता है। जिसके कारण स्थानीय एजेंसियों से लेकर स्थानीय लोगों को रोजगार मिलता है...

ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल वॉलेट के नाम पर हो रही लूट

- भोलेभाले किसान ज्यादा पैसे देने को मजबूर - ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक साक्षरता के लिए सरकार को पहल करना चाहिए (अनुराग तागड़े) 9893699969 इंदौर। शहरी क्षेत्र में रहने वाले लोग इस बात को लेकर बेहद खुश होते हैं कि उनके पास डिजिटल वॉलेट है और वे कहीं पर भी पैसे दे सकते हैं या ले सकते हैं वह भी मोबाईल के माध्यम से। निश्चित रुप से यह सुविधाजनक है और काफी अच्छा भी है। परंतु इससे विपरीत ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल इंडिया की पहुंच तो हो गई है परंतु डिजिटल तकनीक का प्रयोग किस तरह और क्यों हो रहा है इसकी जानकारी ही किसानों को नहीं है। इंदौर, उज्जैन व आसपास के कई ग्रामीण इलाकों में अब भी किसान बैंकिंग से डरते हैं और मोबाईल से पैैसे जमा हो सकते हैं या प्राप्त कर सकते हैं इसकी कल्पना भी उनके मन में कभी नहीं आई। चेक ही नहीं समझ पाते तो डिजिटल वॉलेट की बात कहां से समझेंगे दरअसल ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक साक्षरता की दर काफी कम है। लोगों के पास मोबाईल आ गया है और उस मोबाईल से बातचीत कैसे करना इतना भर किसानों को आने लगा है परंतु आर्थिक लेन-देन कैैसे करें अभी इसकी जानकारी नहीं है। ग्रा...

इतना आसान नहीं उड़ान का उड़ान भर पाना

- इंदौर ग्वालियर के बीच आठ ट्रेने उपलब्ध है (अनुराग तागड़े) 9893699969 केंद्र सरकार ने उड़ान योजना के अंंतर्गत देश के 45  हवाई अड्डो को जोड़ने की महती योजना बनाई है। सरकार ने एक घंटे की उड़ान के लिए 2500 रुपए किराया तय किया है। 128 नए मार्गो पर विमान उड़ान भरेंगे और अगले 6 माह में इसका असर नजर आने लगेगा ऐसा केंद्र सरकार का मानना है।  दरअसल एविएशन सेक्टर चाहे घरेलू हो या विदेशी लगता है कि संभावनाओं से भरा है पर असल में यह क्षेत्र काफी अलग है और इसमें लगातार सेवा में बने रहने के लिए काफी मेहनत करना पड़ती है। इतना ही नहीं इसमें काफी संसाधन लगाने पड़ते है। हमें केवल विमान उड़ान भरते हुए नजर आता है पर उसके पीछे का बैकग्राउंड म्युजिक बजाने के लिए काफी संसाधन और लोगो की जरुरत पड़ती है जिसका खर्च काफी ज्यादा होता है। सरकार ने उड़ान योजना के अंतर्गत 19-78 सीट वाले विमानों को उड़ान भरने की अनुमति दी है। इस श्रेणी के जितने भी विमान भारत में उड़ान भरते है या इस स्कीम के बाद जितने भी विमान अनुमति प्राप्त कंपनियां भारत में लीज पर लाएंगी उनके मेंटेनेंस खर्च काफी होता है। इस श्रेणी में एटीआ...

गोलू वाले भियाहोन का क्या करें

(अनुराग तागड़े) शहर की सड़क पर गोलू वाले भियाहोन की कोई कमी नहीं है ये सड़क के बीचोबीच दोपहिया वाहन (अमूमन मोटरसाईकल) चलाते हैं। नम्बर प्लेट पर गोलू, से लेकर मोनू, िपंकू, टिंकू, रिंकू से लेकर भगवान के प्रति आस्था प्रकट करने वाले तमाम तरह के चिन्ह आदि रहते हैं। इन गोलूओं की विशेषता रहती है कि वे गाड़ी चलाने की अपेक्षा लहराने में ज्यादा दिलचस्पी दिखाते हैं। लहराते समय इनकी अदाएं देखने लायक होती हैं, ये अजीब सा मुंह भी बनाते हैं, दोनों पैैरों के पंजे ऊपर उठा लेते हैैं और हाथों की मुद्रा भी देखने लायक होती है और ये गाड़ी को दाएं-बाएं भी घुमा लेते हैं। इतना ही नहीं अगर ये  भिया जोश में आ गए तो आपको गाना भी सुनने को मिल सकता है वह भी जोर की आवाज में। वहीं कुछ अपनी आवाज को अच्छा नहीं मानते तो तेज हॉर्न का प्रयोग जरूर कर लेते हैं।  अगर सड़क पर लड़कियां चलती हुईं नजर आ जाएं तब भियाहोन की जैसे बांछें ही खिल जाती हैं और फिर सड़क पर जैसे सर्कस ही आरंभ हो जाता है। कई बार बिना काम के भी एक ही सड़क पर मंडराना भी आरंभ हो जाता है। अच्छा ऐसा नहीं है कि इसमें गोलू वाले भियाहोन ही शामिल हैं कुछ हा...

शिक्षा माफिया पर कसो नकेल

ट्रांसपोर्ट...खाना सबकुछ आउटसोर्स - बढ़ती जा रही निजी स्कूलों की मनमानी - डमी एडमिशन से मालामाल हो रहे स्कूल वाले - किसी भी तरह से फीस बढ़ाने के तरीके ढूंढते हैं - होम स्कूल का बढ़ रहा प्रचलन (अनुराग तागड़े) 9893699969 इंदौर। प्रदेश शासन भले ही स्कूल संचालकों की गोद में बैठकर प्रदेश के निजी स्कूलों को मनमानी करने की अनुमति देता रहे पर असलियत यह है कि बड़े-बड़े पांच सितारा स्कूलों से आम जनता का मोह भंग होता जा रहा है। यहां पर पढ़ाई छोड़कर बाकी अन्य गतिविधियों पर ध्यान देने की बात सामने आती है और सभी के लिए पैसे अभिभावकों से लिए जा रहे हैं। आपसी होड़ और दिखावे के इस युग में माता-पिता अपने बच्चों को सबसे सर्वश्रेष्ठ स्कूल में भर्ती करवाते हैं। इसके कारण भी अजीब तरीके के होते हैं जैसे स्कूल की बस ए.सी. वाली है, स्कूल में बच्चों को खेलने के लिए सॉफ्ट फ्लोर है और स्कूल में उच्च गुणवत्ता वाला खाना दिया जाता है।  पर जब शिक्षा की बात आती है तो स्कूल वाले माता-पिता पर सब कुछ थोप देते हैं। एडमिशन के लिए इवेंट का सहारा निजी स्कूलों में अब एडमिशन का तरीका भी बदल गया है। निजी स्कूल ...

अनुष्का शर्मा ने लगे रहो मुन्नाभाई में एक्स्ट्रा का काम भी किया था

(अनुराग तागड़े) फिल्म इंडस्ट्री में ऐसी कम ही अदाकारा है जिन्होंने अपने करियर को बहुत तेज गति से आगे बढ़ाया हो और साथ में उसे प्रोफेशनल तरीके से संभाला भी हो। अनुष्का शर्मा ऐसी कलाकार है जो सही मायने में बॉलीवुड की तासीर को समझती है और किस तरह से प्रोफेशनल तरीके से आगे बढ़ना है यह भी उन्हें खूब आता है। अनुष्का सफलता को आगे कैसे ले जाना यह जानती है और यह भी जानती है कि भारतीय फिल्म इंडस्ट्री में किसी भी नायिका को काम करने का वर्ष काफी कम होते है। जहां पर नायिका 35 वर्ष के पार हुई कि नायिकाओं को रोल मिलना कठिन हो जाता है। ऐसे कई उदाहरण है जिसमें नायिकाओं ने दो चार हिट फिल्में दी है पर बाद में करियर जैसे ही ढलान पर आ जाता है वे कुछ भी नहीं कर पाती । सिनेमा के बदलते दौर में अब महिला केंद्रीत फिल्में भी बनने लगी है और रियेलेस्टिक फिल्मों के दौर में नई कहानियों को काफी पसंद किया जा रहा है। इस ट्रेंड को अनुष्का ने बहुत अच्छे से पहचान लिया है और इसी के अनुरुप उन्होंने अपने करियर को आगे बढ़ाने का प्रयास किया है।  अनुष्का का जन्म अयोध्या में हुआ है और उत्तरप्रदेश की संस्कृति को वह बेहत...

शिक्षा माफिया पर कसो नकेल

शिक्षा मंत्रीजी फीस बढ़ाने के अलग तरीके मत ढूंढो - स्कूल बस एसी तो किराया बढ़ाने जैसे तरीकों का होगा गलत इस्तेमाल  - निजी स्कूल कैटेगरी बनने के बाद भी फीस बढ़ाने के तरीके ढूंढ लेंगे - निजी स्कूलों को रेग्युलेट करने लिए अथॉरिटी का गठन किया जाए (अनुराग तागड़े) इंदौर। हमारी प्रदेश सरकार भी गजब ही है जिन निजी स्कूल संचालकों को फीस कम करने के लिए कहना चाहिए उन्हीं को अपने पास बुलाकर शिक्षा मंत्री कुंवर विजय शाह इस बात के सुझाव मांग रहे हैं कि भाई आप अपना खर्चा बता दो फिर उसके अनुसार फीस बढ़ाने के तरीकों पर विचार करेंगे। कोई भी निजी स्कूल संचालक यही कहेगा कि मंत्री महोदय स्कूलों में सुविधाएं जुटाने के लिए काफी पैसा लगता है अब आप ही बताएं कि फीस क्यों न बढाएं? मंत्री महोदय को आम जनता और अभिभावकों से चर्चा करना चाहिए।  किस प्रकार से निजी स्कूल बेतहाशा फीस वृद्धि कर देते हैं और किस प्रकार से अब भी कमीशनखोरी चलती है यह किसी से छुपा नहीं है।  सरकारी ठप्पा लगने के बाद मनमानी निजी स्कूल संचालक पांच श्रेणियों में अपने आप को विभक्त कर लेंगे। फिर सरकारी ठप्पा लगते ही मनमानी ...