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दोस्ती से दोस्ताना तक....

समय वाकई बदल गया है और दोस्ती को 'दोस्ताने" की नजर से भी देखा जाने लगा हैं। दोस्ताना याने क्या? अब तक दोस्ताना का मतलब दो लोगों के बीच दोस्ती ही समझी जाती थी परंतु करण जौहर की फिल्म दोस्ताना जिसमें गे (समलैंगिग) संबंधों के बारे में बाते हुई है के बाद से दोस्ती को भी शायद नजर लग गई हैं। अब दो दोस्त ज्यादा दोस्ती का इजहार भी करते है तब उन्हें दोस्ताना के नजर से देखा जा सकता हैं। दोस्ती को साहित्यकारों ने न जाने कितने खुबसुरत शब्दों में पिरों कर प्रस्तुत किया हैं। एक ऐसा खुशनुमा एहसास जहाँ पर अपने मन की बात कह सकते हैं पर विदेशियों ने इस मन में भी तन की सहभागिता जरुरी समझी और ऐसे संबंधों को जायज़ ठहराने लगे। लगातार अपनी इस कथित दोस्ती को वे सही साबित करने में जुटे रहे। विदेशों में इसे अनुमति भी मिल गई और वही की देखा देखी हमारे देश में भी दोस्ती की नई परिभाषा को गढ़ने के लिए कवायद आरंभ हो गई। पहले दो सहेलियों या दोस्तों की शादी को समाज अजूबा या पागलपन करार देता था पर गत कुछ वर्षो में यह अमीरों का शगल बन गया और भारत जैसे देश में अमीरों के विरुद्ध बोलना हमारे गुणसुत्रों में ही नहीं ह...

महाराजा का अंतिम सरकारी इलाज

सरकार चाहे जितने बडे उद्योगपतियों और विशेषज्ञों की सेवा लेकर एअर इंडिया को घाटे से उबारने की कोशिश करे...एअर इंडिया में बदलाव लाना बड़ा मुश्किल कार्य हैैं। दरअसल एअर इंडिया की तबियत ठीक करने के लिए बार बार सरकारी अस्पताल में ले जाने की जरुरत नहीं हैं। महाराजा के तबियत बिगड़ने को लेकर कई प्रश्न उठे है और सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि तबियत अचानक तो नहीं बिगड़ी? गत पांच सात वर्षो से लगातार एअर इंडिया की सेवाओं में कमी देखी जा रही थी और जहां तक लाभ कमाने की बात है वह दूर की कौडी नजर आ रही थी। सरकार ने इन पांच सात वर्षो में निजी एअरलाईंन्स को बढ़ाने के लिए काफी प्रयत्न किए और उन्हें सुविधाएँ भी दी पर किसी ने भी एअर इंडिया की तरफ क्यों नहीं ध्यान दिया? विमान में यात्रा करने वाले आम भारतीयों का एअर इंडिया से मोह भंग होने के एक नहीं अनेक कारण है जिनमें सबसे बड़ा कारण यही है कि एअर इंडिया के कर्मचारी स्वयं महाराजा जैसा व्यवहार करते हैं। निजी एअरलाईन्स में यात्रा करने के बाद एअर इंडिया की सेवाओं में कमी नजर आना सामान्य बात है। उड़ान के दौरान विमान परिचारिकाओं का व्यवहार हो या फिर उड़ान में देरी भी आम हैं। ...

बजट से मायूस क्यों?

( अनुराग तागड़े) बजट को ेकर शहरी क्षेत्रों में मायूसी भरी तिक्रियाएँ दी गई । दरअस इस बार के बजट को अगर ध्यान से देखे तब सरकार का संपूर्ण ध्यान ग्रामीण क्षेत्र की ओर ही था और होना भी चाहिए था। मल्टीप् ेक्स में सिनेमा देखकर और पिज्जा बर्गर संस्कृति को आत्मसात कर चुके बड़े शहर यह भू जाते है कि देश का अधिकांश हिस्सा आज भी गांवों में ही बसता हैं। गांव हमारी रीढ़ है और अगर उन्हें आगे आने का मौका नहीं मि रहा हैं तब उनके ि ए बजट में ावधान जरुर होना ही चाहिए। ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार ग्यारंटी योजना (नरेगा) काफी ोि य रही। इसमें 100 दिन का रोजगार दिया ही जाता हैं। वैसे इस योजना को ेकर कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि इस कारण ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों ने खेती करना छोड़ दिया है क्योंकि उन्हें सौ दिन के रोजगार की ग्यारंटी जो मि रही हैं। खैर यह दो चार गांवों की कहानी हो सकती है परंतु पूर्णता के साथ देखे तब इस बजट ने पह ी बार ग्रामीण भारत के विकास की ऐसी तस्वीर पेश की है जिसमें गांवों में विकास की सही मायने में बातें होंगी(अगर सही अर्थो में गांवो तक पैसा पहुँचा तब)। दरअस बजट व उसकी तिक्रिया दोनों ही श...

कहां ले जा रहा है यह नंगापन?

नंगेपन की आवृत्ति बढ़ रही है। इंटरनेट से ेकर सार्वजनिक जीवन में नंगेपन को ले तरह तरह के विरोध और समर्थन हो रहे है और आश्चर्य की बात यह है कि नंगेपन को आधार बनाकर तमाम तरह की बाते हो रही है जिनमें गंभीरता कम व फुहडता की बाते ही ज्यादा हो रही हैै। इंटरनेट पर अश् ी ता का जा काफी ंबे समय से फै ा हुआ है पर गत एक वर्ष की ही बाते करे तो कई स्थापित साइट्स द्वारा अपनी हिट्स बढ़ाने के ि ए तमाम सीमाओं को पार कर अश् ी ता में डुबोकर ऐसी खबरे परोसने गे जो सामान्य रुप से नजर नहीं आती थी। कामुकता और नग्नता को बढ़ावा देती इन खबरो के कारण जाहिर है हिट्स भी बढे है। ये तो हुई इंटरनेट की बात जहां पर न कोई रोकटोक है और न ही किसी कार का तिबंध। अब कुछ दिन पूर्व ब्रिटेन के आक्सफोर्ड विश्वविद्या य के जुनियर वर्ग के छात्रो ने केंपस में ही नग्न होकर तस्वीरें खिंचवाई। वे नग्न होने के ि ए यह तर्क दे रहे है कि इससे तीसरी दुनिया के देशो की सहायता करेंगे। उनकी फोटो का कै ेंडर बनेंगा जिसे बेचा जाएगा। ठीक इसके विपरित हमारे देश में कानपुर शहर के चार कॉ ेजो में ड़कियों के कॉ ेज में जीन्स पहनकर आने पर तिबंध गाया गया और शिक्षिक...

सरोद के एक युग का अंत

उ अ ी अकबर खां ध्दांि (अनुराग तागड़े) कहते है कि संगीत के दर्दी ोगो के सम्मुख स्तुति देना आसान बात है संगीत में कठिन का मत ब जिन्हें संगीत का बिल्कु भी ज्ञान नहीं है उन्हें भी झुमने पर मजबूर करना। उ अ ी अकबर खां की गिनती देश के ऐसे संगीतज्ञों में होती थी जिन्होंने देश के साथ ही विदेशों में भारतीय संगीत का चार किया। सरोद वादन के ति आम संगीत ेमियों का सुनने का अंदाज बद ने वा े उ अ ी अकबर खां के निधन से सरोद के एक ऐसे युग का अंत हुआ है जिसमें सरोद को ेकर न जाने कितने योग हुए। फिल्मों से ेकर जुग बंदियों में नए योग करने वा े खां साहब बाबा अ ाउद्दीन खां के पुत्र होने के नाते सफ नहीं हुए। उन्होंने सरोद वादन की ऐसी शै ी विकसित की जिसमें आ ापी से ेकर जोड़ झा े तक संपूर्ण स्तुति आम ोता को खुब भाती थी और खासतौर पर तब े व सरोद के बीच सवा जवाब महफि की जान हुआ करते थे।1922 में जन्में खां साहब ने मात्र तीन वर्ष की आयु में अपने पिता से संगीत की शिक्षा ेना आरंभ कर दिया था। आरंभ में उन्होंने गायन की ता ीम ी व अपने चाचा फकीर आफताबउद्दीन से तब े की शिक्षा ी।18 घंटे की रियाजअ ी अकबर खां साहब...

कोई चप्पल जुते क्यो ना मारे इन दीवानो को?

कोई चप्पल जुते क्यो ना मारे इन दीवानो को? (अनुराग तागड़े) दीवानो का क्या है कुछ भी कहते रहते है...अब अपने आडवाणीजी को ही े ीजिए पाकिस्तान में जाकर इन्होंने अपना ोहा ग वाया था (भाजपा आडवाणी को ौह पुरुष के रुप में ोजेक्ट कर रही है) उस कारण उन्हें अब जाकर खडाउ खाने को मि ी। आडवाणी के अ ावा अब तक बुश,चिदंबरम,जिंद को भी जूते खाने को मि े है। एक बात इन सभी में एक जैसी है कि फेंकने वा ा का निशाना सही नहीं रहा। शायद कुछ दिनो बाद पार्टिया चप्प जुते खाने से कैसे बचे इसके विशेष शिक्षण सत्र भी आयोजित करने गे। वही आम जनता जुते या चप्प मारने की ेक्टिस कर इसका योग करे तो परिणाम भी उनकी इच्छाअनुरुप हो सकते है। खैर इन सत्ता के दीवानो को अब जुते चप्प खाने की आदत हो जाएगी। पार्टियो के विशेष शिक्षण सत्रो में क्रिकेटरो को बु ाकर कैच पकडने की ेक्टिस भी करवाई जाएगी और जुते चप्प े पड़ने वा े नेता को सि ब्रिटी की तरह देखा जाने गेगा। दरअस संपूर्ण मस े पर गंभीरता से विचार किया जाए तो यह साफ नजर आ रहा है कि हम ोकतंत्र में रह रहे है परंतु हमें अपनी भावनाओं के गटीकरण करने के ि ए मौके नहीं मि ते है ...

ऊर्जा के क्षेत्र में जल्द करना होगा ढेर सारा निवेश

ऊर्जा के क्षेत्र में जल्द करना होगा ढेर सारा निवेश - 1।6 तिशत तिवर्ष की दर से मांग बढ़ रही है इंटरनेशन एनर्जी एजेंसी द्वारा हा ही में उर्जा संबंधी जारी किए गए आंकडो से एक बात साफ हो गई है कि विश्व में 2030 तक उर्जा की मांग 1.6 तिशत तिवर्ष की दर से होने वा ी है और वर्तमान में आई मंदी का असर उर्जा क्षेत्र पर गहरा पड सकता है क्योंकि इस क्षेत्र में वर्तमान में काफी कम निवेश हो रहा है।एजेंसी के अनुसार वर्तमान में उर्जा की मांग में कमी आई जिसका कारण मंदी है तथा ते की बढ़ती कीमते। पर एजेंसी का यह भी कहना है कि इसक मत ब यह नहीं है कि उर्जा के क्षेत्र में निवेश को कम किया जाए। अगर निवेश कम हुआ तो भविष्य में जाकर मांग आपूर्ती में अंतर आ सकता है। चीन और भारत को एजेंसी ने उर्जा क्षेत्र में सबसे ज्यादा निवेश करने वा े देश जिनकी उर्जा की मांग 2030 तक दोगुनी से ज्यादा हो सकती है। विश्व में उर्जा के क्षेत्र में 2030 तक तिवर्ष एक ट्रि यन डॉ र के निवेश की जरुरत है तब जाकर मांग की पूर्ती की जा सकती है।सस्ते ते का दौर समाप्तएजेंसी ने ते के माम े में यह कहा है कि अब सभी देशो को इस बात का ध्यान रखना...