गुरुवार, नवंबर 16, 2017

स्मृति शेष पद्मविभुषण गिरिजा देवी...


सांगितिक आभा मंडल के दैदिप्यमान ओज से वे दमकती रहती थी
(अनुराग तागड़े)
जितनी लरजती गरजती उनकी आवाज उतना ही मीठा उनका बोलना...शब्दों का चयन भी जैसे कौन सबसे ज्यादा मीठा है यह विचार करके करती थी। गायकी के कई स्वरुप आए...तैयारी वाले कलाकार भी आए और चले गए परंतु गिरिजा देवी अपनी साधना और कार्यक्रमों में मस्त...वे सुरों की सच्चाई और गहराई को जानती थी और सच्चे सुर ही परब्रह्म है इस पर उनकी सिद्धहस्तता थी। दुनिया जहां उन्हें ठुमरी क्वीन के नाम से जानती है पर रागदारी पर क्या पकड़ थी उनकी। किसी भी राग की शुद्धता को वे कभी नहीं छोड़ती थी और अमूमन यह कहा भी जाता है कि अगर कोई ठुमरी,चैती,होरी और गजÞल गायक है तब वह शास्त्रीय रागों के साथ उतना न्याय नहीं कर पाता है परंतु गिरिजा देवी मुंह में पान गिलौरियां भले ही चबा रही हो पर जब बात रागों की आती तब चेहरे पर भी गंभीरता और पवित्रता का अनुठा संगम देखने को मिलता था। सेनिया बनारस घराने की गिरिजा देवी की गिनती ऐसे गायको में होती है जिन्होंने संपूर्ण जीवन सुरों को समर्पित कर दिया जिन्होंने नाते रिश्तेदारों से कही गुना ज्यादा रिश्ता सुरों से जोड़ा और न केवल स्वयं को इस क्षेत्र में आगे ले गए बल्कि बड़ा शिष्यवर्ग भी तैयार किया। 
आईटीसी के वो दिन शास्त्रीय संगीत के स्वर्णीम दिन थे
आईटीसी संगीत रिसर्च एकेडमी की स्थापना कोलकाता में हुई थी और आज भी आईटीसी में से प्रशिक्षण प्राप्त कलाकार सर्वोच्च शिखर को छू रहे है। आईटीसी ने देश के सर्वश्रेष्ठ गुरुओं का पैनल बनाया था जो नवोदित कलाकारों को प्रशिक्षित करता था और उन्हें रहने खाने की सुविधा भी देता था। प्रशिक्षण प्राप्त युवा शास्त्रीय संगीत के माहौल में ही डूबा रहता था और जब वह बाहर निकलता था तब ऐसे कलाकार के रुप में उसकी गिनती होती थी जो भविष्य में बेहतरीन कलाकार बनेगा ही। आईटीसी ने देश को कई कलाकार दिए जिनमें उस्ताद राशिद खान जैसे कलाकार भी शामिल है। आईटीसी में कोई भी युवा गायक प्रशिक्षण के लिए जाता था तब उसके मन में यह बात जरुर रहती थी कि भले ही कितने भी बड़े गायक कलाकार जैसे पं.अजय चक्रवर्ती आदि से वह गाना सीखे पर एकाध बार तभी ठुमरी के लिए गिरिजा देवी से मुलाकात कर ले। गिरिजा देवी युवाओं को ठुमरी की लचक और प्रस्तुतिकरण और बोलो का प्रयोग आदि सिखाती जरुर थी परंतु वे सबसे पहले रागदारी,सुरों की सच्चाई पर जोर दिया करती थी। आईटीसी के माध्यम से और वैसे वैयक्तिक रुप में भी गिरिजा देवी ने कई शिष्य तैयार किए। 
कोलकाता में ही मन रमता था
 वैसे तो गिरिजा देवी का संबंध बनारस घराने से है और वे वही पर लगातार रही भी और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में भी सेवाएं दी परंतु आईटीसी के कारण उनका लगातार कोलकाता आना जाना लगा रहता था और कोलकाता में जिस तरह से कलाओं को आगे बढ़ाने के लिए प्रयत्न किए जाते है उससे वे बेहद प्रभावित थी और यही कारण रहा कि वे लगातार कोलकाता में आना जाना करती रहती थी। 
सांगितिक परिपक्वता की प्रतिमूर्ति
गिरिजा देवी जी ने शास्त्रीय संगीत में निहित अध्यात्मिक पक्ष को भी पकड़े रखा। उनके पति के निधन के पश्चात वह स्वरुप भी काफी नजर आया। वे बच्चों की तरह स्वभाव वाली और बेहद नजाकत और साफगोई से बातचीत करती थी। बाबुल मोरा नैहर छूट जाए की गंभीरता के साथ साथ होरी में निहित अल्हडपन का आनंद भी वे बहुत लेती थी। उनकी महफिल में सुनने वालों में दर्शक तो होते ही थे साथ ही हरेक कलाकार के साथ उनका इतना आत्मीय संबंध होता था कि वे कलाकार भी पहली पंक्ति में बैठकर गिरिजा जी का गाना जरुर सुनते थे। वे बेहतरीन कलाकार के साथ साथ बेहतरीन इंसान भी थी और निश्चित रुप से इतने गुणी व्यक्ति का चले जाना दु:ख देता है। गिरीजा देवी अपने आप में ऐसी शख्सियत थी जो अपने सांगितिक आभा मंडल के दैदिप्यमान ओज से सदा दमकती रहती थी और उनकी एक मुस्कुराहट ही दर्शको को प्रभावित कर जाती थी इतना पावित्र्य उनसे लोगो को मिलता रहता था। 

मुकुल राय के माध्यम से कैलाश जी का कद बढेगा?


- कैलाश विजयवर्गीय को कोर्ट से राहत भी मिल चुकी है
(अनुराग तागड़े)
इंदौर। भाजपा महासचिव कैलाश विजयवर्गीय को पार्टी ने पश्चिम बंगाल की कमान सौपी थी। मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी के तेवर और वहां पर टीएमसी कार्यकर्ता जिस प्रकार से व्यवहार कर रहे थे उससे साफ जाहिर था कि पश्चिम बंगाल में मामला वैसा नहीं है जैसा सोचा जा रहा था और पश्चिम बंगाल में चुनाव परिणाम में यह बात सामने आ भी गई थी। इसके बावजुद भाजपा महासचिव ने लगातार पश्चिम बंगाल में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई। वहां के बड़े दिग्गज भाजपा नेताओं के साथ मिलकर कैलाश विजयवर्गीय ने विरोध प्रदर्शन और धरने भी दिए। टीएमसी से इस्तीफा देने के बाद बड़े नेता मुकुल राय ने भाजपा का दामन थामा है। मुकुल राय भाजपा महासचिव कैलाश विजयवर्गीय से संपर्क में थे और उन्हें समारोह पूर्वक भाजपा में शामिल किया गया। भाजपा के लिए बंगाल में यह एक शुरुवात हो सकती है वही दूसरा पक्ष यह भी है कि मुकुल राय पर सारदा चिटफंड घोटाले में शामिल होने का आरोप लगा हुआ था और सीबीआई की जांच में भी उनका नाम है इस कारण उन्होंने भाजपा का दामन थाम लिया है। वही ममता बेनर्जी ने मुकुल राय को क्यों जाने दिया यह प्रश्न भी बड़ा रोचक है। ममता बैनर्जी यह पहले ही कह चुकी है कि बीजेपी उनके नेताओं को तोड़ सकती है। यहां पर कैलाश विजयवर्गीय की भूमिका महत्वपूर्ण है जिन्होंने पश्चिम बंगाल में जहां एक ओर टीएमसी से सीधे लोहा लिया वही मुकुल राय को लेकर पश्चिम बंगाल भाजपा के भीतर जो भी कुछ चल रहा था उसे भी संभाला। मुकुल राय भाजपा में आने की चर्चा गत कुछ दिनों से थी पर इसे लेकर पश्चिम बंगाल भाजपा के भीतर ज्यादा उत्साह नहीं था। कारण साफ था क्योंकि चिटफंड घोटाले और सीबीआई की जांच में मुकुल राय का नाम था। यही कारण था कि मुकुल राय को लेकर भाजपा के भीतर ही सोच एक नहीं हो पा रही थी। कुछ समय पूर्व भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के पश्चिम बंगाल दौरे में उन्होंने यह साफ कह दिया था कि सभी के लिए भाजपा के दरवाजे खुले रखो। इस नीति के कारण टीएमसी के भीतर भी अजीब घबराहट फैल गई और ममता बैनर्जी को यह डर बैठ गया है कि आगामी पंचायत चुनाव और उसके बाद लोकसभा और फिर विधानसभा चुनावो तक भाजपा अपना काडर बेस बढा सकती है। जिस प्रकार से भाजपा ने अब आक्रमक रुख पश्चिम बंगाल में अपना लिया है उससे साफ जाहिर है कि भविष्य में पार्टी का ध्यान इस राज्य पर बहुत ज्यादा रहेगा। वही दूसरी ओर मुकुल राय के पार्टी में आ जाने से सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि टीएमसी के दूसरे बड़े नेताओं से संपर्क करने के लिए भाजपा को आसानी होगी। आगे आने वाले कुछ महीनों में टीएमसी के कई नेता भाजपा में शामिल होते नजर आएंगे और इसमें भाजपा महासचिव कैलाश विजयवर्गीय की भूमिका महत्वपूर्ण होगी । 

कांग्रेस में आजकल क्या चल रहा है...नर्मदा यात्रा


(अनुराग तागड़े)
नर्मदे हर...की गूंज और कांग्रेस नेता की पूछपरख दोनों में समानताओं का दौर जब चलने लगे तब अनुभवी कांग्रेसी नेता पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के दबदबे का एहसास होता है। नर्मदा किनारे वे यात्रा कर रहे है और कयासो का दौर लगातार चलते जा रहा है। शहर कांग्रेस से लेकर प्रदेश कांग्रेस में बस एक ही बात है क्या चल रहा इन दिनों कांग्रेस में बस नर्मदा यात्रा चल रही है। सही मायने में नर्मदा यात्रा के माध्यम से पूर्व मुख्यमंत्री छालो,पैरों का दर्द और यात्रा करने का सुकुन का एहसास जरुर कर रहे है परंतु यह यात्रा स्पंदन पैदा कर रही है कांग्रेस में और आम कांग्रेसी कार्यकर्ताओं में। दिग्विजय सिंह भले ही रोजाना कुछ किलोमीटर पैदल चल रहे हो पर नर्मदा किनारे से कई किलोमीटर दूर तक यात्रा का असर नजर आता है। यात्रा को देखादेखी की यात्रा शुरुवाती दौर में कहा जा रहा था परंतु जिन लोगो ने यात्रा को करीब से देखा वे कहने लगे कि ये क्या नेताजी सही मायने में चल रहे है और नर्मदा किनारे पैदल ही चल रहे है और कोई दिखावा नहीं। प्रदेश कांग्रेस के भीतर हल्के उत्साह की लहर अभी भी न महसूस की जा रही हो परंतु जिस उत्साह से नर्मदा के किनारे पूर्व मुख्यमंत्री का स्वागत कर रहा है वह अपने आप में अलग बात है। मां नर्मदा परिकम्मा वासियों का ख्याल रखती है और 3 वर्ष 3 महीने तक यह यात्रा चलती है और अक्सर यह देखा जाता है कि नर्मदा यात्रा के पश्चात सबकुछ त्याग करना सामान्य सी बात है मन नहीं लगता दुनियादारी में और व्यक्ति एकनिष्ठ होकर भगवतप्राप्ती की ओर लग जाता है। नर्मदा परिक्रमा अनुभवों की ऐसी लंभी श्रृंखला है जिसमें पाप पुण्य से परे व्यक्ति खुद की खोज में लगता है। कर्म की शक्ति ओर भाग्य का साथ होगा की नहीं यह नहीं सोचता बस नर्मदे हर में सबकुछ समाया होता है। पूर्व मुख्यमंत्री यह बात भी नर्मदा यात्रा के दौरान दिग्विजय सिंह भूल गए होंगे क्योंकि वे मन के मैल को नर्मदा के जल से धो रहे है वे इस नर्मदा यात्रा में खुद को नए तरीके से खोज रहे है जिसमें आत्ममंथन,आत्मविश्लेषण सबकुछ अपने आप हो ही जाता है। नर्मदा किनारे का हरेक शिवाला मुक्ति का केंद्र है और भक्ति को बढ़ाने वाला है। दिग्विजय सिंह नर्मदा यात्रा में आत्मसम्मान से परे आत्मा का सम्मान करने निकले है। वे भले ही लोकप्रियता नहीं चाहते हो परंतु मां नर्मदा के किनारे उनके लिए भीड़ खींच रहे है और यह भीड़ ठेठ ग्रामीणों की है जिनके लिए दिग्विजय सिंह का नर्मदा किनारे घूमना ही अपने आप में अजूबा है। उनके लिए बड़े साहब भी नर्मदा परिक्रमा लगा रहे है यह बात ज्यादा महत्वपूर्ण है और ये हमारे जैसे ही है। दिग्विजय सिंह ने आरंभ में ही कह दिया था कि यह मेरा वैयक्तिक मामला है और इसे राजनीति से ना जोड़ा जाए पर ऐसा होता है क्या? प्रदेश के बड़े कांग्रेसी भी जुड़े ओर अब यह लोकप्रियता के मामले में दिग्विजय सिंह की नर्मदा यात्रा सोशल मीडिया पर भी जोर पकड़ते नजर आ रही है। दिग्विजय सिंह जहा पर भी जा रहे है वहा की स्थानीय गतिविधियां जो भी चल रही है उसमें भी शामिल हो जाते है। उनका यह स्वरुप लोगो को पसंद आ रहा है। दिखावे से दूर गमछा बांधे दिग्विजय सिंह लोगो को अपने से लग रहे है और नेता से परे आम आदमी जैसे लग रहे है। दिग्विजय सिंह की यह नर्मदा यात्रा अपने आप में कई बातों को समाहित किए हुए है। यात्रा के समापन के पश्चात एक तप किए हुए दिग्विजय सिंह सामने आएंगे जो आम जनता से मिलकर और उनकी भावनाओं को समझकर अपना अगला कदम रखेंगे जो निश्चित रुप से प्रदेश कांग्रेस में अलग ही लहर पैदा करेगा। 

परमात्मा का भेद जानने की ओढ


(अनुराग तागड़े)

मन को नियंत्रित करने की बातें सुनने में काफी अच्छी लगती है पर कम लोग ही नियंत्रण की बात को आत्मसात कर पाते है। यह राह अपने आप में बिरली है जिस पर चल पाना हरेक के बस की बात नहीं है क्योंकि नियंत्रण हम आदतों पर नहीं कर पाते तब मन के नियंत्रण की बात बहुत दूर हो जाती है। मन को चंचल कहा गया है पर असल में मन का स्वरुप सकारात्मक और नकारात्मक दोनों रहता है जैसे हीरो और विलेन फिल्मों में रहते है वैसे ही मन की अवस्था भी होती है वह किसी भी घटना को लेकर तत्काल आपको उसके सभी पक्षों से अवगत करवा देता है। और अवगत करवाने वाली प्रक्रिया इस बात पर निर्भर करती है कि आप किस परिवेश में पले बढ़े है और आप किस वातावरण में रह रहे है। मन आदत में पड़ जाता है पर उस दौर में भी आपको लगातार अपनी बात बताता रहता है यह बात अलग होती है कि हम सुनते नहीं है। इन सभी बातों के बीच जब मन को नियंत्रित करने की बात आती है तब मन विद्रोही तेवर ही अपना लेता है व नियंत्रित नहीं होना चाहता वह आवारागर्दी करने लगता है और कई बार बावले की तरह हरकतें भी करता है। वह अपने घोड़े दौड़ाने में ज्यादा विश्वास करता है और बार बार पुरानी यादों के सहारे अपने तर्कों को प्रस्तुत करते रहता है भले ही वर्तमान उससे मेल न खाता हो पर वह अपने तर्को पर अडिग रहने की आदत से बाज नहीं आता। 
मन परमात्मा का भेद जानने के लिए भीतर से लालायित रहता है परंतु परिस्थितियों को सच मानकर वह नियंत्रित नहीं होना चाहता और परमात्मा को मानता जरुर है पर जानने का प्रयत्न नहीं करना चाहता। वह जानता है कि उसकी जड़ वह है और चैतन्यता की और जाना है तब परमात्मा की ओढ़ के आगोश में स्वयं को ले जाना पडेगा परंतु फिर भी नहीं मानता। कई बार समय अपने आप यह करवाने के लिए बाध्य करता है और मन परमतत्व को जानने की चाह में नियंत्रित होने की कला को सीखने का प्रयत्न करता है। यह प्रयत्न कठिन होते है इतने कठिन की भटकाव हर क्षण होता ही रहता है। समय परिस्थितियां और स्वयं मन ही भटकाव का कारण होता है। परमात्मा की ओढ़ में मन जब लगता है तब यह रास्ता सुखों की खान की ओर जाने जैसा है यह सुख भौतिक सुखों की तुलना से परे है। इसमें आनंद,सुख और किसी अपने से मिलने की भावनाएं होती है। परमात्मा को देखने,पाने और उसका सामिप्य पाने की लालसा अपने आप में सुखकारी है और यह प्रक्रिया आनंद से भरी है जिसमें बरबस आंखो से कभी भी कही पर भी आंसू ढुलक पड़ते है। आनंदअश्रुओं की धारा जब बहती है तब अपने आप में ऐसे सुख की अनुभूती होती है जिसकी कल्पना सामान्यतौर पर नहीं हो पाती। परमात्मा का अंश याने हम चुंबक की भाती उसकी ओर खींचे चले जाते है पर यह ओढ़ हमें खुद ढूंढना पड़ती है हमें स्वयं प्रयत्न करना पड़ते है तब जाकर परमात्मा की छाया के दर्शन हो पाते है वह भी बिरलो को। 

चकमस्ती में आग लगे बस्ती में...


(अनुराग तागड़े)
भिया किधर....मल्लारगंज काम से जा रिया हूँ अरे मेरे को भी छोड दे यार राजवाड़े पे...आ बैठ चलते हे। भिया सही के रिया हूँ अपने सेर की बात ही अलग हेगी...खाने पीने में सबकुछ एक नंबर हेगा...हां भिया पर मेरे को लग रिया हेगा कि सेर में अब राजनीतिवाले लोगोन काम बिगाड़े भोत कर रिये हेंगे...अपने लोगोन तो क्या है किधर भी कुछ भी कर लियो बोलते ही नी हेंगे। वो भिया परसो में सांची वाले से झिगझिग कर रिया था अरे वो मानने को ही तैयार नी हेगा कि गलती हो गई हेगी। भिया ये लोगोन सुधरने को तैयार ही नी मेने बोला भिया क्या हुआ तुम्हारे टैंकरोन का...मिलावट तो भोत की तुम लोगोन ने अब भी नी मान रिये हो। वो बोला भिया तुम मान ही नी रिये हो अब सबकुछ सहीसाट चल रिया हेगा। भिया अपन तो एबले हेंगे बोल दिया परमाण क्या हेगा? अपना दिमाग सटका तो फिर अपन किसी के नी...पर तुम लोगोन सांची का दूध लेते थे क्या वो दुकान से...नी भिया वो तो ऐसे ही मजे ले रिया था ईन लोगोन को भी तो समझ में आनी चिए ना कि हम भी कम थोड़े ही हे। पर भिया अपना तो सोचना ही ऐसा हेगा कि रहो चकमस्ती में आग लगे बस्ती में पर ये लोगोन सुधरहीच नी रिये हे। एक वो लोगोन हे वो बुखार वुखार आ के लोगोन ठीक हो गए ओर ये भिया लोगोन अब जाके वो मच्छरोन के पीछे जा रिये हेंगे। भिया में तो केता हूँ इन लोगोन को अपनी पड़ी रेती हेगी अपने सेर का क्या होगा इन लोगोन को थोड़े ही पता....ये तो अपन लोग ही हेंगे जो इत्ता विचार करते है नी तो ये लोगोन तो सेर जाए भाड़ में अपनी मोजमस्ती में लगे रेते हेंगे...बस ये अन्ना भिया के पास में उतार दे....चल मिलते फिर। ओर क्या भिया भोत दिनों बाद आए इधर...अरे वो अपना एक चेला हेगा वो उधर जा रिया था मेने का मेरे को वहां तक छोड़ दे भोत दिन हो गए राजवाड़े गए। ये कोन से चेले को पकड लिया भिया...अरे अपने भोत चेले हेंगे....बोलो भिया बोल्डर की सिकी....!

राजनीति में कोई किसी का सगा नहीं


- भाजपा के भीतर मारपीट कांड के बाद सन्नाटा
(अनुराग तागड़े)
इंदौर। राजनीति में अपने आप को ऊपर ले जाने के लिए किसी भी हद तक लोग जा सकते हैं और नेता तो जाते ही हैं। दशहरा मैदान मारपीट कांड के बाद यह कहा जा रहा है कि बात दिल्ली तक पहुंच गई है और बहुत सारी बाते हो रही हैं। इन सभी बातों में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भाजपा प्रदेशाध्यक्ष नंदकुमार चौहान के सामने सब कुछ हुआ याने अनुशासन नाम की कोई बात ही नहीं रही। उद्योगपति हेमंत नीमा के साथ जो व्यवहार किया गया वह किसी भी धार्मिक आयोजन स्थल पर नहीं होना चाहिए। 
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार दोनों के बीच कहासुनी हुई और इसमें कई ऐसी बातें भी थीं जो भाजपा शहर अध्यक्ष कैलाश शर्मा को चुभ गईं। ऐसी कौन सी बातें थीं जिसके कारण कैलाश शर्मा का पारा एकदम आसमान पर पहुंच गया और प्रदेशाध्यक्ष नंदकुमार चौहान के सामने लोगों ने नीमा के साथ न केवल झूमाझटकी की बल्कि प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार मारा भी गया है जिसमें यह कह कर मारा कि आपने हमारे शहर अध्यक्ष का अपमान किया है। यह अजीब है जब प्रदेश अध्यक्ष स्वयं खड़े हैं तब शहर अध्यक्ष का अपमान होने के बाद उसका बदला भी लिया जा रहा है। इतना ही नहीं सीएचएल अस्पताल में स्थितियां और भी खतरनाक हो गई थीं जब स्वयं प्रदेश अध्यक्ष को कई लोगों को फोन लगाने पड़े तब जाकर कार्यकर्ता वहां से हटे। इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भाजपा प्रदेश अध्यक्ष की इतनी धमक भी नहीं कि उनके सामने ही इस प्रकार की बातें हों और वे कुछ भी नहीं कर पाएं। क्या प्रदेशारध्यक्ष अब भी विचार मंथन ही कर रहे हैं?
इस घटना एक पहलू यह भी है कि अमूमन शांत स्वभाव वाले कैलाश शर्मा को ऐसा क्यों करना पड़ा? क्या हेमंत नीमा ने कैलाश शर्मा की दुखती रग पर हाथ रख दिया था? क्या हेमंत नीमा का प्रदेशाध्यक्ष के साथ मेलजोल बढ़ाना कैलाश शर्मा को अखरता था? वैसे भी राजनीति में कोई किसी का सगा नहीं। अगर कोई यह समझता है कि वह दो नंबर का खास है या चार का या फिर खुद की बातें करता रहे तब वह गलत है। वैसे कैलाश शर्मा और मधु वर्मा की दोस्ती की बातें भी बहुत हो रही हैं। यह अलग ही समीकरण बन रहा है और अगर बन रहा है तब इसकी जानकारी भी संगठन को होगी ही। 
विधायक रमेश मेंदोला की भूमिका
इस संपूर्ण प्रकरण में रमेश मेंदोला की भूमिका को लेकर यह कहा जा सकता है कि उन्होंने आयोजन स्थल पर दोनों के बीच कहासुनी हुई तभी से मामले को रोकने का प्रयत्न जरुर किया परंतु हेमंत नीमा ने कैलाश शर्मा को भड़काने की कोई कसर नहीं छोड़ी जिसके बाद मारपीट तक की नौबत आ गई। इतना ही नहीं रमेश मेंदोला देर रात तक मामला और न बढ़ जाए इस पर नजर रखे हुए थे। 
अब संगठन क्या करेगा ?
इस संपूर्ण मामले को लेकर भाजपा संगठन क्या करता है इसे लेकर चचाएं हैं। चित्रकुट की हार और उसके बाद बने माहौल को ध्यान में रखते हुए अब भाजपा संगठन को शहर में भाजपा कार्यकर्ताओं के मन की बात को रखना होगा और इस बात का ध्यान रखना होगा कि भविष्य में इस प्रकार की स्थितियां उत्पन्न न हों।

तेजी से बढ़ रहे एविएशन सेक्टर के लिए क्या म.प्र. तैयार है?

- वर्ष 2020 तक भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा एविएशन बाजार
- वर्ष 2030 तक भारत में हवाई अड्डों की संख्या होगी 250
- भारतीय हवाई अड्डों पर वर्ष 2032 तक 11.4 मिलियन टन मालभाड़ा जाएगा
- सभी हवाई अड्डों पर बायोमेट्रिक जानकारियों से प्रवेश होगा
(अनुराग तागड़े)
इंदौर। शहर से विदेश के लिए सीधी उड़ान की तैयारियों के बीच यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि इंदौर में जेट एयरलाइंस ने नाईट पार्किंग के लिए भी जगह मांगी है। यह दोनों तथ्य इस बात की ओर इंगित कर रहे हैं कि इंदौर की तरफ अगर प्रदेश सरकार सही तरह से ध्यान दे तो इंदौर के देवी अहिल्याबाई होलकर हवाई अड्डे की तेजी से प्रगति को कोई नहीं रोक सकता।
जिस प्रकार से लो कॉस्ट एयरलाइंस को सफलता मिल रही और भारतीय अर्थव्यवस्था जिस प्रकार से आकार ले रही है उससे साफ जाहिर है कि हवाई यातायात में तेज गति से वृद्धि होना है। प्रदेश में इंदौर और भोपाल ही ऐसे हवाई अड्डे हैं जहां से बहुत ज्यादा बिजनेस आने की उम्मीद है। दोनों ही हवाई अड्डों में से इंदौर ने जो प्रगति की है वह अपने आप में काबिलेतारीफ है। इंदौर हवाई अड्डे ने तीन वर्षों में 4 लाख यात्रियों की बढोत्तरी की है। इंदौर में 2016-17 में 17.8 लाख यात्रियों ने हवाई यात्रा की है 2014-15 के 13.5 लाख यात्रियों की तुलना में।
इंदौर अन्य शहरों से उदाहरण ले सकता है
भविष्य में यह बात तय है कि हवाई अड्डों पर बायोमेट्रिक तरह से ही जांच होगी परंतु अपने आप को आगे लाने के लिए इंदौर हवाई अड्डे को अलग तरह की पहल करना होगी। जिस प्रकार से नागपुर हवाई अड्डे ने गर्ल चाईल्ड को लेकर मुहिम चलाई थी उसके कारण नागपुर हवाई अड्डे की प्रसिद्धि सभी दूर हो गई थी। याने अब किसी भी हवाई अड्डे को आर्थिक रुप से आगे आना है तब आउट आॅफ द बॉक्स विचार करना होगा। जिस प्रकार से सूरत हवाई अड्डे ने सूरत में चलने वाली बीआरटीएस बसों को हवाई अड्डा परिसर में आने के लिए जगह दी उसी तर्ज पर इंदौर में अभी से योजना बन सकती है जिसके कारण यात्रियों का समय भी बचेगा और वे जल्दी से हवाई अड्डे पर पहुंच भी सकेंगे। 
भारतीय आकाश का परिदृश्य इस प्रकार का होगा
- लो कॉस्ट एयरलाइंस में खाना नहीं देने से हवाई अड्डों पर रेस्टोरेंट की मांग बढ़ी। आगे आने वाले दिनों में हवाई अड्डों के आसपास ही एसईजेड को आकार दिया जा सकता है और हवाई अड्डे सहित आसपास के इलाकों को बिजनेस हब के रुप में विकसित किया जा सकता है। इंदौर हवाई अड्डे के पास पर्याप्त जगह है इस प्रकार के कार्य करने के लिए। साथ ही हाल ही में 28 एकड़ अतिरिक्त जमीन के बारे में बातचीत चल रही है उस पर अगर अमल हो जाता है तब इस प्रकार का बिजनेस हब बनाया जा सकता है।  
वर्ष 2020 तक भारत में 800 एयरक्राफ्ट उड़ान भरने लगेंगे
देश में जिस प्रकार से लो कॉस्ट एयरलाइंस को सफलता मिल रही है उससे यह आंकड़ा बिल्कुल प्राप्त करने योग्य है कि वर्ष 2020 तक भारत के आकाश में 800 एयरक्राफ्ट उड़ान भरेंगे। कल्पना करें कि इंडिगो ने एक ही दिन में 900 फ्लाईट उड़ाकर रेकॉर्ड बनाया था और अगर 800 एयरक्राफ्ट उड़ान भरेंगे तब देश के आकाश में एयर ट्राफिक कितना होगा।
क्या करना होगा प्रदेश को
एयर ट्राफिक बढ़ने के दो ही तरीके हैं जिसमें से एक बिजनेस है और दूसरा पर्यटन। प्रदेश के पास दोनों ही बिंदुओं में आगे बढ़ने के लिए पर्याप्त कारण हैं। प्रदेश में पर्यटन के लिए तमाम तरह की सुविधाएं मौजूद हैं। हमें अपने आप की ब्रांडिंग करना होगी खासतौर पर विदेशों में तब जाकर प्रदेश के पर्यटन को तेज गति से बढ़ावा मिलेगा। साथ ही देश के पर्यटन स्थलों को हवाई मार्ग से कैसे जोड़ा जाए इसका भी ध्यान रखना होगा। इससे निश्चित रुप से प्रदेश में हवाई यात्रियों की संख्या में वृद्धि हो सकती है। 

इंदौर को एमआरओ हब के रुप में विकसित करें
मेंटेनेंस रिपेयर ओवरहॉल (एमआरओ) केंद्र के रुप में इंदौर को विकसित किया जा सकता है। भारत में एमआरओ बिजनेस 500 मिलियन का है जो कि वर्ष 2020 तक 1.5 मिलियन डॉलर होने की संभावना है। भारतीय विमान कंपनियां अपने रेवेन्यू का 13 से 15 प्रतिशत इस पर खर्च करती हैं। इंदौर देश के ह्रदय स्थल में स्थित है इसके कारण यहां पर पार्किंग के साथ ही एमआरओ हब के रुप में भी विकसित किया जा सकता है। मालभाड़े के लिए भी प्रयास किए जाने चाहिए ताकि इंदौर से खाद्य पदार्थों से लेकर दवाईयां आदि सीधे निर्यात की जा सकें। प्रदेश सरकार अगर गंभीरता के साथ विचार करे और न केवल विचार करे बल्कि योजना को मूर्तरुप सही तरीके से और समयबद्ध करे तब इंदौर हवाई अड्डे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लाने से कोई नहीं रोक सकता। 
कुछ अन्य तथ्य
- वर्तमान में 60 प्रतिशत एयरपोर्ट ट्राफिक पीपीपी मॉडल में हैंडल किया जाता है बाकी का 40 प्रतिशत 
विमानपत्तन प्राधिकरण द्वारा। 
- ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट विकसित करने होंगे। आंध्रप्रदेश ने 6 शहरों में इसकी योजना बनाई है। प्रदेश में इसकी योजना बनाई जा सकती है।
- वर्ष 2016-17 में 264.99 मिलियन यात्रियों ने सफर किया जो कि 421 मिलियन होगा 2020 तक।
- प्रदेश में 27 हवाई पट्टियों के विकास की बात की गई थी परंतु उस पर अमल आरंभ नहीं हुआ है।
- पर्याप्त प्रचार के अभाव में प्रदेश में रीजनल कनेक्टिविटी को बढ़ावा नहीं मिल पा रहा है।